देह के साथ हम पैदा होते हैं . प्रकृति की तमाम और प्रजातियों की ही तरह हम मानव भी एक प्रजाति ही हैं . जैसे हर प्रजातियों के गुण धर्म होते हैं वैसे ही हम मानवों ( होमोसेपियंस ) के भी . हर प्रजाति का एक अपना देह नियम , रचना होती है .प्रवृत्ति होती है .आहार ,निद्रा, भय, मैथुन, जिग्यांसा के भी नियम भी हर प्रजाति को अलग अलग संचालित करते हैं ,हमें भी . जलचर ,थलचर या जमीन के नीचे ही सही , कहाँ पर वह निवास ,विचरण करता है या आहार पाता खोजता है ,जिसमे आकाश भी शामिल है ,यह भी प्रकृति अपनी संरचना में ही तय करती है. सभी जन्म और मृत्यु को प्राप्त करते हैं. तो यह तो हर प्रजाति के मूल नियम होते हैं.
प्रवृत्ति ,जिग्यांसा , सोच को मैं सामान्यतः ' मन ' की श्रेणी में रख रही हूँ ,खास कर हम मानवों के सन्दर्भ में . कुछ प्रजातियाँ सामाजिक होती हैं तो कुछ सीमित रूप में सामाजिक और कुछ नहीं भी . सामाजिक से मेरा मतलब सिर्फ यह है कि समूह रूप में रहने वाली प्रजातियाँ . परिवार , घर , समाज और अपने समान प्रजाति के साथ अंतर्संबंध ( अन्य प्रजातियों के साथ भी ) ,और सामाजिक नियमों के तहत जन्म से मृत्यु तक का सफ़र तय करने वाली .
समाज और उसका नियमन , मानवों की इसी सामूहिक सामाजिक प्रकृति जन्य प्रवृति का अंग है . हाँ अलग अलग समूहों के सामाजिक नियम , कानून , और उसका नियमन अलग अलग भी होते हैं . देश ,काल , भौगोलिक स्थिति ,प्राकृतिक परिश्थिति , परंपरा या ऐतिहासिक कारन ,पारस्परिक मूल्य ,बड़े सारे पहलू इसे तय करते हैं . और इस सब के अलावा और बावजूद भी , व्यक्ति अपने आप में भी एक इकाई होता है . उसका स्वभाव , देह, मन और मानसिक संरचना और मनोवैज्ञानिक पहलू भी हर एक की अपनी विशिष्ठ व्यक्तिगत पहचान भी होती है . उसका लिंग और देह तथा सामाजिक परिवेश और परिस्थितितियाँ भी कारक होते हैं.
पेशे से चिकित्सक होने के नाते वैसे मेरा पेशागत काम तो देह चिकित्सा ही है ,पर देह भी और उसकी समस्याएं यानी दैहिक स्वास्थ्य भी ,मन की प्रवृत्ति , जैविक ( तात्पर्य जेनेटिक भी शामिल है ) संरचना और सामाजिक मूल्यों और सामाजिक अवधारणा व नियमन ,सब मिल कर ही दैहिक स्वास्थ्य भी निश्चित करते हैं . ये सब अन्तर्निहित भी हैं और परस्पर अवलंबित भी . इसीलिये हर देह चिकित्सक को भी और हर देह रुग्ण को भी ( मानसिक रुग्णता सहित ) , इन सब से रूबरू होना ही पड़ता है तथा ये सब अवयव चिकित्सक की जानकारी और चिकित्सा की योग्यता का ही अंग हैं , या मेरा मानना है कि होने चाहिए .
इसीलिये देह ,मन और समाज तीनों के ही स्वास्थ्य परस्पर गुंथे हैं .व्यक्ति और समष्टि की हमारी भारतीय अवधारणा भी यही इंगित करती है ,हमारे प्राचीन चिकित्सा शाश्त्र में भी . चरक और सुश्रुत से लेकर आधुनिक चिकित्सा पद्धति भी इस से सहमत है .
और इसी लिए यह ब्लॉग भी ....... इन्हीं अवयवों की मीमांसा का विषय भी है और कारक/कारण भी . चिकित्सा पद्धतीयाँ अलग हो सकती हैं , इलाज और दवाएं भी , परन्तु इनके आपसी परस्पर अवलंबन को नज़रंदाज़ कर कोई पद्धति और चिकित्सा अपर्याप्त ही नहीं शायद बेअसर भी हो सकती है .
अतः .......
' स्वस्थ .......देह ,मन और समाज ' .......... आपके सामने है .
आगे चलकर इसके स्वरुप में प्रश्न और उत्तर भी शामिल हो सकते हैं , इंटर एक्टिव भी हो सकता है या आपकी जरूरत ,जिग्यांसा और सहयोग के आधार पर , जैसे भी सुनिश्चित होगा , है आपके लिए ही . सूचना और जानकारी तथा अनुसन्धान हो रहे छेत्रों का विषय भी इसमें शामिल होगा .
गो कि हर देह ,हर मन अलग होता है , विभिन्न समाज भी अपने आप में एक इकाई ही होते हैं , पर हर व्यक्ति और व्यक्तित्व काफी बहुत अलग ही होते है , अपनी अँगुलियों की छापों की तरह, सामान्य और असामान्य भी .
मानव निर्मित कारखाने भले ही एक ही माडल के तमाम उत्पाद बना लें ,प्रकृति का कोई उत्पाद शायद ही सम्पूर्ण डुप्लीकेट होता है :) .
आशा है कि आप सब का स्नेह ,प्रेम ,सहयोग ही नहीं ,आपसे मार्ग दर्शन भी मिलेगा .
अगली कड़ी होगी ' मन से मन तक ' .
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7 टिप्पणियां:
intjar rahega.narayan narayan
नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ द्वीपांतर परिवार आपका ब्लाग जगत में स्वागत करता है।
pls visit......
www.dweepanter.blogspot.com
नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ द्वीपांतर परिवार आपका ब्लाग जगत में स्वागत करता है।
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हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें
Gambheer aalekh hai..shubh kamna sweekar kare..!
स्वस्थ विचार,भाषा और प्रस्तुति, धन्यवाद. कृपया मेरा स्वास्थ संबंधी ब्लॉग भी देखें और ठीक समझें तो लिंक करें.
http://swastik-shubham.blogspot.com
बेहतरीन लिखा है आपने.
जारी रहें. शुभकामनाएं.
[उल्टा तीर]
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